Thursday, August 20, 2009

वास्तविकता का विरोधाभास

वास्तविकता में आज कोई भी जीना नहीं चाहता है सब मृग मारीचिका में जी रहे हैं इनाम के लालच में पता नहीं क्या क्या कर रहे हैं पर्दे के पीछे झांकने का साहस किसी के पास नहीं है और मंच पर सजा दृश्य देख कर हर्षित हो रहे हैं लेकिन वास्तविकता पर्दे के पीछे है उसे देखने के लिए इक्षाशक्ति की ज़रुरत है क्योंकि वास्तविकता बड़ी कठोर बड़ी निर्लज्ज बड़ी पीडा देने वाली है उसमें कोई नहीं जीना चाहता है शायद इसी लिए यह संसार आडम्बर बनता जा रहा है जैसे हर क़दम पर धोखा , चारो तरफ माया जाल , तरह तरह के इंद्रजाल में उलझा आज का हमारा समाज , हमे सोचना होगा हम वास्तविकता को क्यों नहीं स्वीकार कर लेते हैं ऐसा जिस दिन हम कर लेंगे हमे आगे बदने से कोई नहीं रोक सकेगा , न संकोच न भय और सुख के साक्षात् दर्शन होने शुरू हो जायेंगे
शायद आपको यह भी मालूम हो की जसवंत सिंह ने उसी सच्चाई में जीते ही कोई किताब लिखी थी और उसके बाद जो हुआ वोह हश्र भी आप ने देखा ही होगा यही हमारे देश का दुर्भाग्य है
द्वारा := एस . ऍम . अजहर दिनक :- २०-८-०९ समय १२:४५

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